Zindagi Shayari 1

मैंने जिन्दगी से पूछा,
सबको इतना दर्द क्यों देती हो..??
जिन्दगी ने हंसकर जवाब दिया,
मैं तो सबको ख़ुशी ही देती हुँ,
पर एक की ख़ुशी दुसरे का दर्द बन जाती है..!!
कहीं बेहतर है तेरी अमीरी से मुफलिसी मेरी,
चंद सिक्कों के लिए तुने क्या नहीं खोया है,
माना.. नहीं है मखमल का बिछोना मेरे पास,
पर तु ये बता, कितनी रातें चैन से सोया है...
मोहब्बत को जो निभाते हैं उनको मेरा सलाम है,
और जो बीच रास्ते में छोड़ जाते हैं उनको, हमारा ये पेगाम है,
"वादा-ए-वफ़ा करो तो फिर खुद को फ़ना करो,
वरना खुदा के लिए किसी की ज़िंदगी ना तबाह करो"
मुझे तैरने दे या फिर बहना सिखा दे,
अपनी रजा में अब तु रहना सिखा दे,
मुझे शिकवा ना हो कभी भी किसी से,
हे इश्वर..!!
मुझे सु:ख और दुःख के पार जीना सिखा दे...
उनको ये शिकायत है कि मैं बेवफाई पे नहीं लिखता,
और मैं सोचता हूं कि मैं उनकी रुसवाई पे नहीं लिखता..

ख़ुद अपने से ज्यादा बुरा जमाने में कौन है?
मैं इसलिए औरों की बुराई पे नहीं लिखता..

कुछ तो आदत से मजबूर हैं और कुछ फितरतों की पसंद है
जख्म कितने भी गहरे हों, मैं उनकी दुहाई पे नहीं लिखता..
लम्हों की खुली किताब है ज़िन्दगी,
ख्यालों और साँसों का हिसाब है ज़िन्दगी,
कुछ जरूरतें पूरी कुछ ख्वाहिशें अधूरी,
इन्ही सवालों के जवाब हैं जिंदगी...
जिंदगी तुझसे हर कदम पर समझौता क्यों किया जाए,
शौक जीने का है मगर इतना भी नहीं कि मर मर कर जिया जाए,
जब जलेबी की तरह उलझ ही रही है तू ए जिंदगी,
तो फिर क्यों न तुझे चाशनी में डुबा कर मजा ले ही लिया जाए।
गम ना कर ज़िन्दगी बहुत बड़ी है,
चाहत की महफिल तेरे लिए सजी है,
बस एक बार मुस्कुरा कर तो देख,
तकदीर खुद तुझसे मिलने बहार खड़ी है...
दिए से ना पूछो उसकी लो में तेल कितना है,
सांसों से ना पूछो बाकी खेल कितना है,
पूछना ही है तो उस मुर्दे से पूछो,
ज़िन्दगी में दर्द और कफ़न में सुकून कितना है...
जब मुल्ला को मस्जिद में राम नजर आए,
जब पंडित को मंदिर में रहमान नजर आए,
सुरत ही बदल जाए इस दुनिया की अगर
इंसान को इंसान में इंसान नजर आए...