Zindagi Shayari 7

जरा सी रौशनी मुझको अच्छी लगी,
मुझे आपके एक लम्हें की हँसी अच्छी लगी,
आपसे बात की जो एक रोज,
उसी दिन से मुझे अपनी ज़िन्दगी अच्छी लगी...
ज़िन्दगी हुस्न है, हर हुस्न की तनवीर अलग,
ज़िन्दगी जुर्म है, हर जुर्म की तज़ीर अलग,
ज़िन्दगी नगमा है, हर नगमें की तसीर अलग,
ज़िन्दगी फूल है, हर फूल की तकदीर अलग...
उतरे जो ज़िन्दगी तेरी गहराईयों में हम,
महफ़िल में रह के भी रहे तन्हाइयों में हम,
दीवानगी नहीं तो और क्या कहें,
इंसान ढूंढ़ते रहे परछाइयों में हम...
रौनक कभी तो कभी तन्हाई है ज़िन्दगी,
बहुत है कभी, तो कभी परछाई है ज़िन्दगी,

हंसी है लबों की कभी रुलाई है ज़िन्दगी,
बेरूख है कभी, तो कभी रहनुमाई है जिंदगी,
ज़िन्दगी एक रात है,
जिसमें ना जाने कितने ख्वाब हैं,

जो मिल गया वो अपना है जो टुट गया वो सपना है,
ये मत सोचो की ज़िन्दगी में कितने पल हैं,

ये सोचो की हर पल में कितनी ज़िन्दगी है,
इसलिए, ज़िन्दगी को जी भरकर जी लो...
ज़िन्दगी को एक पल अपना समझो,
रात को सच और दिन को सपना समझो,
भुलाना चाहते हो अगर सभी गमो को,
तो ज़िन्दगी में किसी एक को अपना समझो...
ज़िन्दगी रोज़ नए रंग में ढल जाती है,
कभी दुश्मन तो कभी दोस्त नज़र आती है,
कभी छा जाए, बरस जाए, घटा बे मौसम,
कभी एक बूँद को भी रूह तरस जाती है...
क्या गम है क्या ख़ुशी मालूम नहीं,
कितना याद करता हूँ तुम्हें मालूम नहीं,
ये पल तो मुझसे कट नहीं रहे,
कैसे कटेगी ये ज़िन्दगी मालूम नहीं...
आ कहीं सामने जरा सा तुझको आँखों में बसा लूँ,
हर ख्वाब को अपने तेरी यादों से सजा दूँ,
निगाहों में बसाकर धड़कनों को तेरा पता दूँ,
फिर उन्हीं के सहारे सारी ज़िन्दगी बिता दूँ...
तेरा दर छोड़के कहाँ जाएं,
जो तुझे भुलादे तो कैसे नाम गुन गुनाएं,
तेरे जैसा दूसरा मिला ना सारे जहाँ में,
तू ही बता ऐ-ज़िन्दगी हम कैसे तुझे भुलाएं...