Naseeb Shayari 3

जो जख्म दे गए आप सागर को,
ना जाने क्यों वो जख्म नहीं भरता,
हम तो मिलना चाहते हैं आपसे मगर,
क्या करें हमारा नसीब नहीं मिलता...
नसीब को समझना है बड़ा मुश्किल,
रातें रोती, सवेरे गाते ही हैं,

दोगले मक्कारों से है भरी दुनिया,
कमीने अफवाह फैलाते ही हैं,

सीधे-साधे आदमी को लूट लेंगे,
बुरे अच्छों पर सितम ढाते ही हैं,

कितने भी बदनामियों के तीर मारें,
जीनते पर हार पहनाते ही हैं...
हर राह पे उनको जीत मिले,
दिल को मधुर संगीत मिले,
अँधेरी राहें भी हो जातीं हैं रोशन,
जिनको नसीब में ऐसा दोस्त मिले...
माँगी थी मौत तो ज़िन्दगी मिल गयी,
अंधेरे में भी मुझे रौशनी मिल गयी,
पूछा खुदा से नसीब में क्या है मेरे,
तो सबसे हँसीं तोफा आपकी दोस्ती मिल गयी...
ना चाहो इतना हमें, चाहतों से डर लगता है,
ना आओ इतना करीब, जुदाई से डर लगता है,
तुम्हारी वफाओं पे भरोसा है,
मगर अपने नसीब से डर लगता है...
शाम-ए-तमन्ना जवान आज भी है,
हर हसरत लेकिन बेज़ुबान आज भी है,
मंजिलों को नहीं नसीब मेरे काफिले तो क्या,
राहों पे मेरे क़दमों के निशान आज भी हैं...
फूलों में रहकर कलियों को चाहूँ,
शायद ऐसी मेरी तकदीर नहीं,
मैं भी प्यार पाऊं किसी का,
शायद मेरे हाथों में वो लकीर नहीं...
बिछड़ के तुमसे जिंदा हूँ, मेरी तकदीर तो देखो,
कभी आकर मेरे हालात की तस्वीर तो देखो,
देकर प्यार की दौलत खरीदे खून के आंसू,
मिली जो इश्क में हमको जागीर तो देखो...
लड़ते रहे तकदीर से पर आखिर हार गए,
जिनको अपना खून पिलाया, वही हमें मार गए,
ये कैसी दुनिया है पत्थरों की ऐ दोस्त,
उनसे दिल लगाके ये हम जान गए...
तकदीर से अपनी सबको शिकायत क्यों है,
जो दोस्त नहीं मिल सकता उसी से मोहब्बत क्यों है,
कितने कांटे हैं राहों पे,
फिर भी दिल को उसी की आरजू क्यों है...