Husn Shayari 2

तेरे हुस्न पर तारीफ भरी किताब लिख देता,
काश की तेरी वफा तेरे हुस्न के बराबर होती...
क्या तुझे कहूँ तू है मरहबा, तेरा हुस्न जैसे है मयकदा,
मेरी मयकशी का सुरूर है, तेरी हर नजर तेरी हर अदा,

तेरे इख़्तियार में है फिजा, तू खिज़ां का जिश्म सवार दे,
मुझे रूह से तू नवाज दे, मुझे जिंदगी से न कर जुदा...
तुम्हें पाने की इसलिए ज़िद नहीं करते,
क्योंकि तुम्हें खोने को दिल नहीं करता,
तू मिलता है तो इसलिए नहीं देखते तुमको,
क्योंकि फिर इस हंसीं चेहरे से नज़रें हटाने को दिल नहीं करता...
हम भटकते रहे थे अनजान राहों में,
रात दिन काट रहे थे यूँही बस आहों में,
अब तम्मना हुई है फिर से जीने की हमें,
कुछ तो बात है सनम तेरी इस निगाहों में...
सच कहते हैं लोग, इश्क़ पर जोर नहीं,
झुके जमाने के आगे, इश्क़ कमजोर नहीं,
यूँ तो बसते हैं हसीं लाखों इस ज़मीं पर,
मगर इस जहान में तुमसे बढ़कर और नहीं...
कोई शायर तो कोई फकीर बन जाये,
आपको जो देखे वो खुद तस्वीर बन जाये,
ना फूलों की ज़रूरत ना कलियों की,
जहाँ आप पैर रख दो वहीं कश्मीर बन जाये...
वो आपका पलके झुका के मुस्कुराना,
वो आपका नजरें झुका के शर्माना,
वैसे आपको पता है या नहीं.. हमें पता नहीं,
पर इस दिल को मिल गया है उसका नज़राना...
हुस्न वाले वफ़ा नहीं करते,
इश्क वाले दगा नहीं करते,
जुल्म करना तो इनकी आदत है,
ये किसी का भला नहीं करते...
इतना हसी क्यों बनाया ख़ुदा ने उनको,
हर कोई चाहता है दिल-ओ-जान से उनको,
बार-बार देखने से दिल नहीं भरता किसी का भी,
आँखों में बसा लेना चाहता है हर शख्स उनको...
हम ना होते तो आपको ग़ज़ल कौन कहता,
आपके चेहरे को गुलाब कौन कहता,
ये तो करिश्मा है हम प्यार करने वालों का,
वरना पत्थरों को ताज महल कौन कहता...