Gila Shikwa Shayari 3

रुकता भी नहीं, ठीक से चलता भी नहीं,
ये दिल है कि तेरे बाद संभालता ही नहीं,
उस उम्र के सेहरा से तेरी याद का बादल,
टलता भी नहीं और बरसता भी नहीं...
पहली बार प्यार किया है उन्हें,
शायद गलती हो गई प्यार करने में,
खुदा से बढकर चाहा है उन्हें,
शायद यही खता हो गई प्यार करने में...
बिठा के सामने जी भर के दीदार करना,
एक रोज़ बाहों में भर के प्यार करना,
मेरी मजबूरी समझना शिकवा ना कोई करना,
हम तेरे ही रहेंगे हमारा ऐतबार करना...
मैं उनके रास्ते की ही तो राही थी,
मंज़िल से मंज़िल तो नहीं मिलाना चाहि थी,
फिर भी उल्फ़त की नाराज़गी क्यों दिखा दी,
उनसे थोड़ी सी मोहब्बत ही तो चाहि थी...
गिला तुझसे नहीं कोई,
गिला अपनी मजबूरियों से करते हैं,
तू आज हमारे करीब ना सही ऐ-दोस्त,
मोहब्बत तो हम तेरी दूरियों से भी करते हैं...
फिर वही फ़साना-अफसाना सुनाती हो,
दिल के पास हूँ कह कर दिल जलाती हो,
बेक़रार है आतिश-ए-नजर से मिलने को,
तो फिर क्यों नहीं प्यार जताती हो...
बदलने वाले तो हर चीज़ बदल देतें हैं,
कमान से निकला तीर बदल देतें हैं,
तुम तो मेरे चार आँसु ना बदल सके,
बदलने वाले तो तकदीर बदल देतें हैं...
यूँ मिले कि मुलाक़ात हो ना सकी,
होंठ काँपे मगर कोई बात ना हो सकी,
मेरी खामोश निगाहें हर बात कह गयी,
और उनको शिकायत है कि कोई बात ना हो सकी...
ना तस्वीर है उसका की दीदार किया जाए,
ना पास है वो जो उसे प्यार किया जाए,
यह कैसा दर्द दिया है उस बे-दर्द ने,
ना उससे कुछ कहा जाए, ना उसके बिन रहा जाए...
वो मुझ तक आने की राह चाहता है,
लेकिन मेरी मोहब्बत का गवाह चाहता है,
खुद आते जाते मौसमों की तरह है,
और मुझसे मोहब्बत की इंतहा चाहता है...