Gila Shikwa Shayari 1

वो मोहब्बत भी तेरी थी, वो नफरत भी तेरी थी,
वो अपनापन और ठुकराने की अदा भी तेरी थी,
हम अपनी वफ़ा का इंसाफ किस्से माँगते,
वो शहर भी तेरा था और अदालत भी तेरी थी...
उसकी चाहत ने रुलाया बहुत है,
उसकी यादों ने तड़पाया बहुत है,
हम उससे करते हैं मोहब्बत बेइन्तेहा,
इस बात को उसने आजमाया बहुत है...
मैं लफ़्ज़ों में कुछ भी इज़हार नहीं करता,
इसका मतलब ये नहीं की मैं तुझे प्यार नहीं करता,

चाहता हूँ मैं तुझे आज भी पर,
तेरी सोच में अपना वक़्त बेकार नहीं करता,

तमाशा ना बन जाए कहीं मोहब्बत मेरी,
इसी लिए अपने दर्द को नमूदार नहीं करता,

जो कुछ मिला है उसी में खुश हूँ मैं,
तेरे लिए खुदा से तकरार नहीं करता,

पर कुछ तो बात है तेरी फितरत में ज़ालिम,
वरना में तुझे चाहने की खता बार-बार नहीं करता...
वो सिलसिले वो शौक वो कुरबत नहीं रही,
फिर यूँ हुआ की दर्द में शिद्दत ना रही,
अपनी ज़िन्दगी में हो गए मशरूफ वो इतना,
कि हमको याद करने की फुर्सत भी ना रही...
ऐ मौत, मैं तुझे गले लगाना चाहता हूँ,
कितनी वफ़ा है तुझमें ये आज़माना चाहता हूँ,
रुलाया है बहुत दुनिया में लोगों ने मुझे,
मिले जो तेरा साथ तो मैं लोगों को रुलाना चाहता हूँ...
चाहने से कोई चीज़ अपनी नहीं होती,
हर मुस्कुराहट खुशी नहीं होती,
अरमान तो होते हैं बहुत मगर,
कभी वक्त तो कभी किस्मत सही नहीं होती...
ना चाहो इतना हमें, चाहतों से डर लगता है,
ना आओ इनता करीब, जुदाई से डर लगता है,
तुम्हारी वफाओं पे भरोसा तो है,
मगर अपने नसीब से डर लगता है...
मुमकिन नहीं किसी को समझ पाना,
समझे बिना किसी से दिल लगाना,
आसान है किसी को प्यार करना,
मगर बहुत मुश्किल है ज़िन्दगी में किसी का प्यार पाना...
तुमने देखा तो हमें प्यार से.. बस इतना ही सही,
तेरा बस हो गया दीदार.. बस इतना ही सही,
तेरा आशिक हूँ तुमने हमें चाहा.. ना सही,
कभी मुझको पहचान लिया.. बस इतना ही सही...
बिकता है गम हँसी के बाजार में,
लाखों दर्द छुपे होते हैं एक छोटे से इंकार में,
वो क्या समझ पाएंगे प्यार की कशिश को,
जिन्होंने फर्क ही नहीं समझा पसंद और प्यार में...