Gam Shayari 4

हर सितम सह कर कितने ग़म छिपाये हमने,
तेरी खातिर हर दिन आँसू बहाये हमने,
तू छोड़ गया जहाँ हमें राहों में अकेला,
बस तेरे दिए ज़ख्म हर एक से छिपाए हमने...
अपनी यादें अपनी बातें लेकर जाना भूल गए,
जाने वाले जल्दी में मिलकर जाना भूल गए,
मुड़-मुड़कर देखा था जाते रास्ते में उसने,
जैसे उसे कुछ कहना था जो वो कहना भूल गए,
वक्त-ए-रुखसत पोंछ रहे थे मेरे आँसू अपने आँचल से,
उसको गम था इतना की वो खुद रोना भूल गए...
प्यार क्या होता है हम नहीं जानते,
ज़िन्दगी को हम अपना नहीं मानते,
गम इतने मिले की एहसास नहीं होता,
कोई हमें प्यार करे अब विश्वास नहीं होता...
तुम्हारे चाँद से चेहरे पे गम अच्छे नहीं लगते,
हमें कह दो चले जाओ जो हम अच्छे नहीं लगते,

हमें वो ज़ख्म दो जाना जो सारी उम्र ना भर पायें,
जो जल्दी भरके मिट जायें वो ज़ख्म अच्छे नहीं लगते,

तुम्हें हर ग़ज़ल में लिखना मेरा दस्तूर है लेकिन,
सारी महफिल करे तेरे चर्चे मुझे अच्छे नहीं लगते,

मैं चाहत की उस मंजिल पे आ पहुँचा हूँ की,
तुम्हारे चाहने वाले मुझे अच्छे नहीं लगते...
टूट जाए ना भरम होंठ हिलाऊं कैसे,
हाल जैसा भी है लोगों को बताऊं कैसे,
खुश आँखों से भी अश्को की महक आती है,
मैं तेरे गम को ज़माने से छुपाऊं कैसे...
धरती का गम छुपाने के लिए गगन होता है,
दिल का गम छुपाने के लिए बदन होता है,
मर के भी छुपाने होंगे गम शायद,
इसलिए हर लाश पे कफ़न होता है...
जाने कब कैसे कहाँ सब खो गया,
जीने को सहारा तेरा गम हो गया,

हँसते-हँसते ही ये सफ़र गुज़रा,
रोने को बहाना तेरा गम हो गया,

बढ़ता रहता है मेरी रातों के लिए,
कैसा ये खज़ाना तेरा गम हो गया,

जिंदा रहते भी तो लाश बनके,
मरने को जनाजा तेरा गम हो गया,

कोई पूछे पता माशूक कहे,
रहने को ठिकाना तेरा गम हो गया...
नीले आसमा में ए चाँद तू है अकेला,
जैसे इस धरा पे मैं मजनू अलबेला,
हर रात तुजसे ही दिल की बात कहता हूँ,
अपनी मुस्कुराहट में गम को छिपा के सहता हूँ...
जाने लगे जब वो छोड़ के दामन मेरा,
टूटे हुए दिल ने हिमाकत कर दी,
सोचा था कि छुपा लेंगें गम अपना,
मगर कमबख्त आँखों ने बगावत कर दी...
वादा किया है तो निभाएंगे,
सूरज की किरण बनकर तेरी छत पर आएंगे,
हम हैं तो जुदाई का गम कैसा,
तेरी हर सुबह को फूलों से सजाएंगे...