Aankhen Shayari 4

बहुत दूर मगर बहुत पास रहते हो,
आँखों से दूर मगर दिल के पास रहते हो,
मुझे बस इतना बता दो ऐ दोस्त,
क्या तुम भी मेरे बिना उदास रहते हो...
भूल सकता है भला कौन ये प्यारी आँखें,
रंग में डूबी हुई नींद सी भरी आँखें,
मेरी हर सांस ने, हर सोच ने चाहा है तुम्हें,
जबसे देखा है तुम्हें, तब से सराहा है तुम्हें,
बस गई हैं मेरी आँखों में तुम्हारी आँखें...
अपनी आँखों में मेरा नाम लिख दो,
हर रोज़ तुम अपना दिल मेरे नाम कर दो,
अगर भूल जाओगे हमें तो मर जायेंगे हम,
तुम अपनी लबों की नर्म खुशबु मेरे नाम कर दो...
आँखों-आँखों में गुजरी है ये रात,
अभी भी शायद अधूरी है आँखों की बात,

सुबह तक का सफ़र कुछ यूँ तह किया हमने,
बिना छुए एक दुझे के साथ कटी हैं ये रात,

थामा है एक दुझे को अपनी अदाओं से हमने,
बिना कुछ बोले ख़ामोशी तोड़ती है सारी रात,

ये जिस्मानी मिलन नहीं रूहानी मेल हुआ है,
साथ रह कर एक दुझे को अपना एहसास दिया है,

ना आता है, ना कभी आएगा गुजरा हुआ लम्हा,
तन को नहीं मन को पाया है हमने सारी रात,

तलब ना मिट पाई तेरे दीदार से जीत की,
चाहे एक नज़र देखता रहा तेरी सूरत सारी रात...
उससे कहना हम मजे में हैं,
बस यादें बहुत सताती हैं,
उनकी दूरी का गम नहीं मुझे,
बस ज़रा आँखें भीग जाती हैं...
आँख जब बंद किया करते हैं,
सामने आप हुआ करते हैं,
आप जैसा ही मुझे लगता है,
ख्वाब में जिससे मिला करते हैं...
तुमने चाहा ही नहीं हालात बदल सकते थे,
तुम्हारे आंसू मेरी आँखों से निकल सकते थे,
तुम तो ठेरे रहे झील के पानी की तरह,
दरीया बनते तो बहुत दूर निकल सकते थे...
क्या बात कहूं उन आँखों की, जिन आँखों पे मैं मरता हूँ,
वो आँखें झील सी ऑंखें हैं, जिन में डूब के रोज़ उभरता हूँ,

मुझे देखने के लिए उठती हैं, मिलते ही नज़र वो झुकती हैं,
सारे जहाँ में ऐसी आँखें नहीं, जिन आँखों पे मैं मरता हूँ,

इन आँखों में कोई आंसू ना आए, कभी कोई गम ना पास आए,
सदा मुस्कुराती रहें ये, हर दम ये दुआ मैं करता हूँ...
उनकी आँखों में अंदाज़ बड़े ही गहरे रहते हैं,
छुप-छुप के वो तारों से हमारी बातें कहते हैं,
जब कोई पूछता है उनसे इस लुत्फ़-ऐ-ज़िन्दगी की वजह,
ना जाने क्यों वो नजरें झुकाए मुस्कुराते रहते हैं...
जो पूछता है कोई सुर्ख क्यों हैं आज आँखें,
तो आँख मल के कहता हूँ कि रात सो ना सका,
लाख चाहूँ मगर यह ना कह सकूँगा कभी भी,
कि रात रोने की ख्वाहिश थी मगर रो ना सका...